कबीर के राम तो अगम हैं और संसार के कण-कण में विराजते हैं। कबीर के राम इस्लाम के एकेश्वरवादी, एकसत्तावादी खुदा भी नहीं हैं। इस्लाम में खुदा या अल्लाह को समस्त जगत एवं जीवों से भिन्न एवं परम समर्थ माना जाता है। पर कबीर के राम परम समर्थ भले हों, लेकिन समस्त जीवों और जगत से भिन्न तो कदापि नहीं हैं। बल्कि इसके विपरीत वे तो सबमें व्याप्त रहने वाले रमता राम हैं। वह कहते हैं:व्यापक ब्रह्म सबनिमैं एकै, को पंडित को जोगी। रावण-राव कवनसूं कवन वेद को रोगी।
कबीर राम की किसी खास रूपाकृति की कल्पना नहीं करते, क्योंकि रूपाकृति की कल्पना करते ही राम किसी खास ढाँचे (फ्रेम) में बँध जाते, जो कबीर को किसी भी हालत में मंजूर नहीं। कबीर राम की अवधारणा को एक भिन्न और व्यापक स्वरूप देना चाहते थे। इसके कुछ विशेष कारण थे, जिनकी चर्चा हम इस लेख में आगे करेंगे। किन्तु इसके बावजूद कबीर राम के साथ एक व्यक्तिगत पारिवारिक किस्म का संबंध जरूर स्थापित करते हैं। राम के साथ उनका प्रेम उनकी अलौकिक और महिमाशाली सत्ता को एक क्षण भी भुलाए बगैर सहज प्रेमपरक मानवीय संबंधों के धरातल पर प्रतिष्ठित है।
कबीर नाम में विश्वास रखते हैं, रूप में नहीं। हालाँकि भक्ति-संवेदना के सिद्धांतों में यह बात सामान्य रूप से प्रतिष्ठित है कि ‘नाम रूप से बढ़कर है’, लेकिन कबीर ने इस सामान्य सिद्धांत का क्रांतिधर्मी उपयोग किया। कबीर ने राम-नाम के साथ लोकमानस में शताब्दियों से रचे-बसे संश्लिष्ट भावों को उदात्त एवं व्यापक स्वरूप देकर उसे पुराण-प्रतिपादित ब्राह्मणवादी विचारधारा के खाँचे में बाँधे जाने से रोकने की कोशिश की।
कबीर के राम निर्गुण-सगुण के भेद से परे हैं। दरअसल उन्होंने अपने राम को शास्त्र-प्रतिपादित अवतारी, सगुण, वर्चस्वशील वर्णाश्रम व्यवस्था के संरक्षक राम से अलग करने के लिए ही ‘निर्गुण राम’ शब्द का प्रयोग किया–‘निर्गुण राम जपहु रे भाई।’ इस ‘निर्गुण’ शब्द को लेकर भ्रम में पड़ने की जरूरत नहीं। कबीर का आशय इस शब्द से सिर्फ इतना है कि ईश्वर को किसी नाम, रूप, गुण, काल आदि की सीमाओं में बाँधा नहीं जा सकता। जो सारी सीमाओं से परे हैं और फिर भी सर्वत्र हैं, वही कबीर के निर्गुण राम हैं। इसे उन्होंने ‘रमता राम’ नाम दिया है। अपने राम को निर्गुण विशेषण देने के बावजूद कबीर उनके साथ मानवीय प्रेम संबंधों की तरह के रिश्ते की बात करते हैं। कभी वह राम को माधुर्य भाव से अपना प्रेमी या पति मान लेते हैं तो कभी दास्य भाव से स्वामी। कभी-कभी वह राम को वात्सल्य मूर्ति के रूप में माँ मान लेते हैं और खुद को उनका पुत्र। निर्गुण-निराकार ब्रह्म के साथ भी इस तरह का सरस, सहज, मानवीय प्रेम कबीर की भक्ति की विलक्षणता है। यह दुविधा और समस्या दूसरों को भले हो सकती है कि जिस राम के साथ कबीर इतने अनन्य, मानवीय संबंधपरक प्रेम करते हों, वह भला निर्गुण कैसे हो सकते हैं, पर खुद कबीर के लिए यह समस्या नहीं है।
कबीर कहते भी हैं
“संतौ, धोखा कासूं कहिये। गुनमैं निरगुन, निरगुनमैं गुन, बाट छांड़ि क्यूं बहिसे!”
Sunday, 19 April 2009
Saturday, 18 April 2009
If parents love their children ...Jiddu Krishnamurti quote

If parents love their children, they will not be nationalistic, they will not identify themselves with any country; for the worship of the State brings on war, which kills or maims their sons.If parents love their children, they will discover what is right relationship to property; for the possessive instinct has given property an enormous and false significance which is destroying the world. If parents love their children, they will not belong to any organized religion; for dogma and belief divide people into conflicting groups, creating antagonism between man and man. If parents love their children, they will do away with envy and strife, and will set about altering fundamentally the structure of present-day society.
As long as we want our children to be powerful, to have bigger and better positions, to become more and more successful, there is no love in our hearts; for the worship of success encourages conflict and misery। To love one’s children is to be in complete communion with them; it is to see that they have the kind of education that will help them to be sensitive, intelligent and integrated.
Education and the Significance of Life, J. Krishnamurti, Chapter 6
As long as we want our children to be powerful, to have bigger and better positions, to become more and more successful, there is no love in our hearts; for the worship of success encourages conflict and misery। To love one’s children is to be in complete communion with them; it is to see that they have the kind of education that will help them to be sensitive, intelligent and integrated.
Education and the Significance of Life, J. Krishnamurti, Chapter 6
Thursday, 16 April 2009
मजहब, जाति और चुनाव
आप लोगों ने मजहब का नाम तो जरूर सुना होगा, जी ये वाही मजहब है जिसकी आड़ लेकर सत्ताधारी जनता को आपस मे लड़ाते रहते है।दह्शतगर्द मासूम लोंगों पर गोलियाँ चलाते रहते हैं. क्योंकि इनके गुरुघण्टाल गुरुओं ने मजहब के नाम पर इनके दिमाग मे दूसरे धर्म के प्रति नफरत ही भरा है और इनकी बेवकूफियों को भुनाकर अपना उल्लू सीधा किया है,जिसे ये धर्मांध समझना नही चाहते. हम सब देश मे सुधार की बात तो करते हैं पर चाहते हैं की इसकी शुरुआत कोई और करे (मेरे भैया की जुबानी मैने सुना था की-"हर इंसान ये चाहता है की महात्मा गांधी फिर से पैदा हो,पर पड़ोसी के घर में")
आज जब आतंकवादी हमलों मे किसी हिन्दू संगठन का नाम आता है तो हिन्दू धर्म के ठेकेदार जमाने भर के हिन्दू दलों और साधु-सन्यासियों की फौज लेकर सड़क पर उत्तर आते है. इसी तरह जब किसी मुस्लिम संगठन का नाम आ जाए तो उनके जमात वाले अपने आकाओं की अगुआई मे उस आतंकी की परवी करने निकल पड़ते है.क्यो ये लोग नहीं सोचते की मानवता और इन्शानियत ही आदमी का असल मजहब है .मैं किसी भी धर्म के पक्षा या विपक्ष मे नहीं हूँ, बल्कि मैं तो चाहती हूँ की सब धर्म के लोग बिना किसी भेदभाव के मिल-जुलकर रहे.जब कोई बच्चा संसार मे जन्म लेता है तो उसे नहीं पता होता की वो हिन्दू है,मुसलमान है, सिख है, ईसाई है, जैन है, बौद्ध है या क्या है ??? ईश्वर ने तो केवल एक स्त्री और एक पुरुष की ही रचना की थी , बाकी चीजें तो इंसान ने खुद ही बनाई है सिवाय प्रकृति के ,आखिर कहीं ना कहीं तो हम एक ही माता-पिता की संतानें हैं. फिर अपने ही भाई-बहनों का खून बहाकर किसी को क्या मिल सकता है.कोइ भी धर्म गलत रास्ता नहीं बताता, ये तो मानने वाले ही हैं जो धर्म को बदनाम कर देते हैं.
मजहब नहीं सिखाता,
आपस मे बैर रखना.......
ये पंक्ति हर मजहब के इंसान को याद रखनी चाहिए.
आज जब आतंकवादी हमलों मे किसी हिन्दू संगठन का नाम आता है तो हिन्दू धर्म के ठेकेदार जमाने भर के हिन्दू दलों और साधु-सन्यासियों की फौज लेकर सड़क पर उत्तर आते है. इसी तरह जब किसी मुस्लिम संगठन का नाम आ जाए तो उनके जमात वाले अपने आकाओं की अगुआई मे उस आतंकी की परवी करने निकल पड़ते है.क्यो ये लोग नहीं सोचते की मानवता और इन्शानियत ही आदमी का असल मजहब है .मैं किसी भी धर्म के पक्षा या विपक्ष मे नहीं हूँ, बल्कि मैं तो चाहती हूँ की सब धर्म के लोग बिना किसी भेदभाव के मिल-जुलकर रहे.जब कोई बच्चा संसार मे जन्म लेता है तो उसे नहीं पता होता की वो हिन्दू है,मुसलमान है, सिख है, ईसाई है, जैन है, बौद्ध है या क्या है ??? ईश्वर ने तो केवल एक स्त्री और एक पुरुष की ही रचना की थी , बाकी चीजें तो इंसान ने खुद ही बनाई है सिवाय प्रकृति के ,आखिर कहीं ना कहीं तो हम एक ही माता-पिता की संतानें हैं. फिर अपने ही भाई-बहनों का खून बहाकर किसी को क्या मिल सकता है.कोइ भी धर्म गलत रास्ता नहीं बताता, ये तो मानने वाले ही हैं जो धर्म को बदनाम कर देते हैं.
मजहब नहीं सिखाता,
आपस मे बैर रखना.......
ये पंक्ति हर मजहब के इंसान को याद रखनी चाहिए.
Wednesday, 15 April 2009
Mother Teresa’s Thoughts: Part - 1
Tuesday, 14 April 2009
हर सांस में हर बोल में
हर सांस में हर बोल में साईं नाम की झंकार है ।
हर नर मुझे भगवान है हर द्वार मंदिर द्वार है ॥
ये तन रतन जैसा नहीं मन पाप का भण्डार है ।
पंछी बसेरे सा लगे मुझको सकल संसार है ॥
हर डाल में हर पात में जिस नाम की झंकार है ।
उस साईंनाथ के द्वारे तू जा होगा वहीं निस्तार है ॥
अपने पराये बन्धुओं का झूठ का व्यवहार है ।
मनके यहां बिखरे हुये साईं ने पिरोया तार है ॥
हर नर मुझे भगवान है हर द्वार मंदिर द्वार है ॥
ये तन रतन जैसा नहीं मन पाप का भण्डार है ।
पंछी बसेरे सा लगे मुझको सकल संसार है ॥
हर डाल में हर पात में जिस नाम की झंकार है ।
उस साईंनाथ के द्वारे तू जा होगा वहीं निस्तार है ॥
अपने पराये बन्धुओं का झूठ का व्यवहार है ।
मनके यहां बिखरे हुये साईं ने पिरोया तार है ॥
Discovery of Real India, Swami Vivekananda

During his travels all over India, Swami Vivekananda was deeply moved to see the appalling poverty and backwardness of the masses। He was the first religious leader in India to understand and openly declare that the real cause of India’s downfall was the neglect of the masses. The immediate need was to provide food and other bare necessities of life to the hungry millions. For this they should be taught improved methods of agriculture, village industries, etc. it was in this context that Vivekananda grasped the crux of the problem of poverty in India (which had escaped the attention of social reformers of his days): owing to centuries of oppression, the downtrodden masses had lost faith in their capacity to improve their lot। It was first of all necessary to infuse into their minds faith in themselves। For this they needed a life-giving, inspiring message. Swamiji found this message in the principle of the Atman, the doctrine of the potential divinity of the soul, taught in Vedanta, the ancient system of religious philosophy of India. He saw that, in spite of poverty, the masses clung to religion, but they had never been taught the life-giving, ennobling principles of Vedanta and how to apply them in practical life.
Thus the masses needed two kinds of knowledge: secular knowledge to improve their economic condition, and spiritual knowledge to infuse in them faith in themselves and strengthen their moral sense. The next question was, how to spread these two kinds of knowledge among the masses? Through education – this was the answer that Swamiji found.
Monday, 13 April 2009
जैसा खाए अन्न वैसा बने मन : डॉ. देवेंद्र जोशी
तपस्या का मूल आधार है मित आहार। मित आहार का मतलब है अत्यंत सीमित मात्रा में जितना आवश्यक हो उतना ही भोजन ग्रहण करना। भोजन में स्वाद की बजाए सात्विकता, शुचिता और पवित्रता का होना साधक की सफलता का अनिवार्य तत्व है। भारतीय शास्त्रों में आहार शुद्धि पर अत्यधिक बल दिया गया है। शास्त्र कहते हैं- 'जैसा खाए अन्ना वैसा बने मन।' अर्थात मनुष्य का मन और आचरण उसके आहार के अनुसार ही चलता है। जीवन में सफलता, यश, कीर्ति, वैभव, महानता, उच्चता और भगवत्प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति का आहार शुद्ध, सात्विक, संतुलितऔर चित्त पर अनुकूल प्रभाव डालने वाला हो।
भोजन केवल जिह्वा की स्वाद संतुष्टि का साधन मात्र नहीं है। यह महज उदरपूर्ति का उपक्रम भी नहीं है। यह साधक की साधना का एक अभिन्ना अंग है। सच कहा जाए तो साधक की साधना का प्रथम सोपान ही आहार शुद्धि है। शास्त्रों में जिसे मित आहार कहा गया है, उसका मतलब केवलआहार की अल्पता ही नहीं वरन उसकी पवित्रता और शुचिता है। साधक का मन साधना में तभी लग सकता है, जबकि उसका आहार सात्विक एवं चित्त को एकाग्रता प्रदान करने वाला हो। घंटों एकांत में बैठकर तप करने वाले या ईश्वरोपासना में दीर्घकाल तक रत रहने वाला व्यक्तिअगर यह सोचे कि इतनी लंबी पूजा-तपस्या करने के बाद अब मैं कुछ भी भोजन करूँ और कितनी भी मात्रा में ग्रहण करूँ इससे तपस्या या पूजा पर क्या असर पड़ने वाला है, लेकिन साधक का ऐसा सोचना गलत है। आहार की शुद्धि के बिना साधक की साधना की पूर्णता संभव नहीं है।
मनुष्य का कर्म, आचरण और जीवन उसके द्वारा ग्रहण किए जाने वाले आहार पर निर्भर करता है। न केवल आहार शुद्ध हो अपितु उसे बनाने वाले हाथ, परोसने वाले और उसमें उपयोग लाए जाने वाले पदार्थ तथा आहार जहाँ तैयार किया जा रहा है वहाँ का वातावरण भी शुद्ध होना चाहिए। शास्त्र तो यहाँ तक कहते हैं कि आहार ग्रहण करने के पूर्व उसे ईश्वर को समर्पित किया जाना चाहिए। सच्चे अर्थों में जिसे आप भोजन मानकर ग्रहण करते हैं, वह प्रभु प्रसाद है। उसे उसी रूप में ग्रहण किया जाना चाहिए। हमारे यहाँ अन्ना को देवता माना गया है। अतः उसे जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करना और झूठा छोड़ना दोनों ही गलत है। मनुष्य को मित आहारी बनकर भोजन को प्रभु प्रसाद मानकर ग्रहण करना चाहिए तभी उसमें मनसा, वाचा, कर्मणा, एकरूपता और आचरण में पवित्रता, और उच्चता का गुण विकसित हो सकता है।
भोजन केवल जिह्वा की स्वाद संतुष्टि का साधन मात्र नहीं है। यह महज उदरपूर्ति का उपक्रम भी नहीं है। यह साधक की साधना का एक अभिन्ना अंग है। सच कहा जाए तो साधक की साधना का प्रथम सोपान ही आहार शुद्धि है। शास्त्रों में जिसे मित आहार कहा गया है, उसका मतलब केवलआहार की अल्पता ही नहीं वरन उसकी पवित्रता और शुचिता है। साधक का मन साधना में तभी लग सकता है, जबकि उसका आहार सात्विक एवं चित्त को एकाग्रता प्रदान करने वाला हो। घंटों एकांत में बैठकर तप करने वाले या ईश्वरोपासना में दीर्घकाल तक रत रहने वाला व्यक्तिअगर यह सोचे कि इतनी लंबी पूजा-तपस्या करने के बाद अब मैं कुछ भी भोजन करूँ और कितनी भी मात्रा में ग्रहण करूँ इससे तपस्या या पूजा पर क्या असर पड़ने वाला है, लेकिन साधक का ऐसा सोचना गलत है। आहार की शुद्धि के बिना साधक की साधना की पूर्णता संभव नहीं है।
मनुष्य का कर्म, आचरण और जीवन उसके द्वारा ग्रहण किए जाने वाले आहार पर निर्भर करता है। न केवल आहार शुद्ध हो अपितु उसे बनाने वाले हाथ, परोसने वाले और उसमें उपयोग लाए जाने वाले पदार्थ तथा आहार जहाँ तैयार किया जा रहा है वहाँ का वातावरण भी शुद्ध होना चाहिए। शास्त्र तो यहाँ तक कहते हैं कि आहार ग्रहण करने के पूर्व उसे ईश्वर को समर्पित किया जाना चाहिए। सच्चे अर्थों में जिसे आप भोजन मानकर ग्रहण करते हैं, वह प्रभु प्रसाद है। उसे उसी रूप में ग्रहण किया जाना चाहिए। हमारे यहाँ अन्ना को देवता माना गया है। अतः उसे जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करना और झूठा छोड़ना दोनों ही गलत है। मनुष्य को मित आहारी बनकर भोजन को प्रभु प्रसाद मानकर ग्रहण करना चाहिए तभी उसमें मनसा, वाचा, कर्मणा, एकरूपता और आचरण में पवित्रता, और उच्चता का गुण विकसित हो सकता है।
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