जब भंवरा फूल पर बैठ जाता है तो रात को जब फूल बंद हो जाता है,
तो भंवरा भी उसी में बंद हो जाता है !
वो बाहर नही जाता !
जो भंवरा सब छेद कर निकल जाता है,
वो ही भंवरा प्रेम के वशीभूत फूल से नही निकलता !
उस में ही मर जाता है !
उसी प्रकार मेरा मन प्रभु आपके चरणों का भंवरा बन गया है,
जो यहाँ से कही नही जाना चाहता !
मन की स्थिति जब इतनी प्रगाड़ता पर पहुचती है !
तब हमारे अन्दर प्रेमाभक्ति का उदय हो जाता है !
अविरल अश्रुपात होने लगता है !
अपने प्रीतम के सिवा कुछ नज़र नहीं आता है !
आठों याम सिर्फ प्रीतम और कुछ नहीं !
मन की इस स्थिति को खाते हैं !
प्रेम भक्ति !
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Wednesday, 3 February 2010
Tuesday, 2 February 2010
अंतर्मुखी बनो
दूसरों की भलाई वुराई देखने में ही जीव का जीवन चला जाता है !
ऐसा जीव ना तो किसी का कल्याण कर सकता है !
और ना ही आत्म कल्याण कर सकता है !
उस जीव का जीवन विल्कुल नष्ट हो जाता है !
हम बाहर की सोचते है !
हम बाहर सहारा ढूंढ़ते है !
बाहर देखने बाले के लिए भगवान का रूप काल का रूप होता है !
बहिर्मुखी जीव का भजन नही बनता है !
वहिर्मुखी रहने पर जीव कुछ नही कर पाता !
इसलिए अंतर्मुखी बनो !
इसीमे कल्याण है !
सब चिन्ताए छोड़ दो !
सुख बाहर नही है अपितु भीतर है !
बाहर रमन मत करो !
वहां कुछ हांसिल होने वाला नहीं है !
बाहर रमण करना बिलकुल ऐसा है !
जैसे किसी तालाब में चन्द्रमा की परछाई दिखे,
और हम उस चन्द्रमा को पाने के लिए तालाब में गोते लगायें !
इसलिए भीतर झांको और भजन करो !
बाकी सब श्री कृष्ण पर छोड़ दो !
ऐसा जीव ना तो किसी का कल्याण कर सकता है !
और ना ही आत्म कल्याण कर सकता है !
उस जीव का जीवन विल्कुल नष्ट हो जाता है !
हम बाहर की सोचते है !
हम बाहर सहारा ढूंढ़ते है !
बाहर देखने बाले के लिए भगवान का रूप काल का रूप होता है !
बहिर्मुखी जीव का भजन नही बनता है !
वहिर्मुखी रहने पर जीव कुछ नही कर पाता !
इसलिए अंतर्मुखी बनो !
इसीमे कल्याण है !
सब चिन्ताए छोड़ दो !
सुख बाहर नही है अपितु भीतर है !
बाहर रमन मत करो !
वहां कुछ हांसिल होने वाला नहीं है !
बाहर रमण करना बिलकुल ऐसा है !
जैसे किसी तालाब में चन्द्रमा की परछाई दिखे,
और हम उस चन्द्रमा को पाने के लिए तालाब में गोते लगायें !
इसलिए भीतर झांको और भजन करो !
बाकी सब श्री कृष्ण पर छोड़ दो !
Monday, 1 February 2010
प्रभु कृपा
दाता बड़ा ही दयाल है !
वो हर क्षण सब का भला करता रहता है !
हमे धैर्य व् विशवास रखना चाहिए !
जो कुछ भी दाता दे रहा है,
दुःख - तकलीफ - कष्ट - चोट,
सुख, दौलत, संतान, कारोबार उन सब को सिर पे लगा लो !
उसे प्रभु की कृपा समझ कर स्वीकार करो !
उसे प्रभु की कृपा समझ कर प्रेम से सहो !
सुख सपना दुःख बुदबुदा दोनों हैं मेहमान !
सबका आदर कीजिये जो भेजे भगवान् !
रोयो या चिल्लायो नही !
स्वीकार करना सीखो !
हर परिस्थिति में उसकी कृपा का अनुभव करो !
ये ही भक्त्ति है !
वो हर क्षण सब का भला करता रहता है !
हमे धैर्य व् विशवास रखना चाहिए !
जो कुछ भी दाता दे रहा है,
दुःख - तकलीफ - कष्ट - चोट,
सुख, दौलत, संतान, कारोबार उन सब को सिर पे लगा लो !
उसे प्रभु की कृपा समझ कर स्वीकार करो !
उसे प्रभु की कृपा समझ कर प्रेम से सहो !
सुख सपना दुःख बुदबुदा दोनों हैं मेहमान !
सबका आदर कीजिये जो भेजे भगवान् !
रोयो या चिल्लायो नही !
स्वीकार करना सीखो !
हर परिस्थिति में उसकी कृपा का अनुभव करो !
ये ही भक्त्ति है !
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