Wednesday, 13 January 2010

काशी साईं की पहली सालगिरह दिनाक 13-01-2010

पर्यावरण शुद्धिकरण व भारत प्रेम की भावना को जागृत करने के लिए आर्या समाज पद्धति से हवन का आयोजन:

पारस नाथ यादव (अधिवक्ता), सतेन्द्र कुमार श्रीवास्तव (अधिवक्ता), अवधेश कुशवाहा(अधिवक्ता), के.डी.सिंह(अधिवक्ता), अंशुमान(सचिव) और काली प्रसाद दुबे(अध्यक्ष) हवन से पूर्व वार्ता करते हुए।

अंशुमान (सचिव), अनुज प्रकाश (प्रवक्ता), अवधेश कुशवाहा(अधिवक्ता), राकेश लाभ, राजबली दुबे, मुकेश, रामदेव शास्त्री(आर्या समाज पुरोहित) हवन करते हुए।

रामदेव शास्त्री (आर्या समाज पुरोहित), त्रिपाठी जी (आर्या समाज ज्ञाता) मुकेश, अवधेश कुशवाहा (अधिवक्ता), काली प्रसाद दुबे(अध्यक्ष), सतेन्द्र कुमार श्रीवास्तव (अधिवक्ता) , के.डी.सिंह (अधिवक्ता) , सूर्य कुमार गोंड (अधिवक्ता) , पारस नाथ यादव (अधिवक्ता) , राजबली दुबे, अनुज प्रकाश (प्रवक्ता), और अंशुमान (सचिव) हवन करते हुए।

रामदेव शास्त्री, त्रिपाठी जी, अंशुमान, काली प्रसाद दुबे और अनुज प्रकाश हवन करते हुए।

अंशुमान हवन मंत्र का पाठ करते हुए।

2 comments:

Anonymous said...

Please continue these type of program of Hawan for Our India.

Anonymous said...

Keep going on.. doing nice work...

सवाल: "काशी साईं" संस्था का उदय कैसे हुआ ?

उतर:
काशी के "महान संत कबीर" ने अपने एक दोहे में यह कहा है कि.....

"साईं इतना दीजिए, जामें कुटुम्ब समाये,
मैं भी भूखा ना रहू, साधू ना भूखा जाए।"


बस "संत कबीर" के इसी दोहे से "काशी साईं" संस्था का उदय हुआ है।

(इस के अलावा "महान संत कबीर" ने और भी अनगिन्नत दोहों में "साईं" शब्द का उपयोग किया है।)


काशी साईं फाउंडेशन सोसाइटी के मूल विचार:-

"मानव प्रेम ही ईश्वर प्रेम है"

"साईं मानव प्रेम, साईं ईश्वर प्रेम"
हमारी सोसाइटी का मानना है, कि भारत में "साईं" नाम ही एक ऐसा नाम है, जो बटवारा नहीं करता इसीलिए हमारी सोसाइटी "जय साईं भारत" कहती है...!!
हमारी सोसाइटी का यह प्रयास है, कि साईं के नाम पर पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोया जाये, ताकि भारत में किसी भी किस्म का बटवारा ना रह जाये....!!

"Jai Sai Bharat"

~~~~~~~~~~~~~ * ~~~~~~~~~~~~~

गुरू र्ब्रह्मा,गुरू र्विष्णुः,गुरू र्देवो महेश्वरः

गुरू र्साक्षात् परब्रह्म् तस्मै श्री गुरवे नमः॥

अखण्ड मण्डलाकांरं व्याप्तं येन चराचरम्

तत्विदं दर्शितं येन,तस्मै श्री गुरवे नमः॥

~~~~~~~~~~~~~ * ~~~~~~~~~~~~~


जन गण मन : रवीन्द्रनाथ ठाकुर

जन गण मन अधिनायक जय हे
भारत भाग्य विधाता
पंजाब सिन्ध गुजरात मराठा
द्राविड़ उत्कल बंग
विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा
उच्छल जलधि तरंग
तव शुभ नामे जागे
तव शुभ आशिष मागे
गाहे तव जय गाथा
जन गण मंगल दायक जय हे
भारत भाग्य विधाता
जय हे जय हे जय हे
जय जय जय जय हे

Note: इस रचना के यहाँ तक के पदों को भारत के राष्ट्रगान होने का सम्मान प्राप्त है। यहाँ से नीचे दिये गये पद भारतीय राष्ट्रगान का अंग नहीं हैं.

Rest Part:

पतन-अभ्युदय-वन्धुर-पंथा,
युगयुग धावित यात्री,
हे चिर-सारथी,
तव रथ चक्रेमुखरित पथ दिन-रात्रि
दारुण विप्लव-माझे
तव शंखध्वनि बाजे,
संकट-दुख-श्राता,
जन-गण-पथ-परिचायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे

घोर-तिमिर-घन-निविङ-निशीथ
पीङित मुर्च्छित-देशे
जाग्रत दिल तव अविचल मंगल
नत नत-नयने अनिमेष
दुस्वप्ने आतंके
रक्षा करिजे अंके
स्नेहमयी तुमि माता,
जन-गण-दुखत्रायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे

रात्रि प्रभातिल उदिल रविच्छवि
पूरब-उदय-गिरि-भाले, साहे विहन्गम, पूएय समीरण
नव-जीवन-रस ढाले,
तव करुणारुण-रागे
निद्रित भारत जागे
तव चरणे नत माथा,
जय जय जय हे, जय राजेश्वर,
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे