Wednesday, 5 August 2009

परदे हटा के देखो : अशोक चक्रधर

ये घर है दर्द का घर, परदे हटा के देखो,

ग़म हैं हंसी के अंदर, परदे हटा के देखो।


लहरों के झाग ही तो, परदे बने हुए हैं,

गहरा बहुत समंदर, परदे हटा के देखो।


चिड़ियों का चहचहाना, पत्तों का सरसराना,

सुनने की चीज़ हैं पर, परदे हटा के देखो।


नभ में उषा की रंगत, सूरज का मुस्कुराना

ये ख़ुशगवार मंज़र, परदे हटा के देखो।


अपराध और सियासत का इस भरी सभा में,

होता हुआ स्वयंवर, परदे हटा के देखो।


इस ओर है धुआं सा, उस ओर है कुहासा,

किरणों की डोर बनकर, परदे हटा के देखो।


ऐ चक्रधर ये माना, हैं ख़ामियां सभी में,

कुछ तो मिलेगा बेहतर, परदे हटा के देखो।


साईं ने कहा है : भाग - 119

साईं ने कहा है, कि.....
"मैं तुम में हूँ,
तुम मुझ में हो,
कोई अन्तर नही।"

Tuesday, 4 August 2009

मस्जिदों के सहन तक जाना बहुत दुश्वार था : राहत इन्दौरी

मस्जिदों के सहन तक जाना बहुत दुश्वार था
देर से निकला तो मेरे रास्ते में दार था

अपने ही फैलाओ के नशे में खोया था दरख़्त,
और हर मसूम टहनी पर फलों का बार था

देखते ही देखते शहरों की रौनक़ बन गया,
कल यही चेहरा था जो हर आईने पे बार था

सब के दुख सुख़ उस के चेहरे पे लिखे पाये गये,
आदमी क्या था हमारे शहर का अख़बार था

अब मोहल्ले भर के दरवाज़ों पे दस्तक है नसीब,
एक ज़माना था के जब मैं भी बहुत ख़ुद्दार था

काग़ज़ों की सब सियाही बारिशों में धुल गई,
हम ने जो सोचा तेरे बारे में सब बेकार था


साईं ने कहा है : भाग - 118

साईं ने कहा है, कि......
"मैं कौन हूँ ? सदा विचार करो।"

Monday, 3 August 2009

अकाल और उसके बाद : नागार्जुन

कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त ।


दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद ।

Note:

रचनाकाल : 1952


साईं ने कहा है : भाग - 117

साईं ने कहा है, कि......
"अगर धनवान हो तो विनम्र हो जाओ।"

Sunday, 2 August 2009

बुरा ज़माना, बुरा ज़माना : नामवर सिंह

बुरा ज़माना, बुरा ज़माना, बुरा ज़माना

लेकिन मुझे ज़माने से कुछ भी तो शिकवा

नहीं, नहीं है दुख कि क्यों हुआ मेरा आना

ऎसे युग में जिसमें ऎसी ही बही हवा

गंध हो गई मानव की मानव को दुस्सह।

शिकवा मुझ को है ज़रूर लेकिन वह तुम से--

तुम से जो मनुष्य होकर भी गुम-सुम से

पड़े कोसते हो बस अपने युग को रह-रह

कोसेगा तुम को अतीत, कोसेगा भावी

वर्तमान के मेधा! बड़े भाग से तुम को

मानव जय का अंतिम युद्ध मिला है चमको

ओ सहस्र जन-पद-निर्मित चिर पथ के दावी!

तोड़ अद्रि का वक्ष क्षुद्र तृण ने ललकारा

बद्ध गर्भ के अर्भक ने है तुम्हें पुकारा।


चंद्रशेखर आज़ाद के अंतिम संस्कार के बारे में जानने के लिए उनके बनारस के रिश्तेदार श्री शिवविनायक मिश्रा द्वारा दिया गया वर्णन पढ़ना समीचीन होगा:-

उनके शब्दों में—“आज़ाद के अल्फ्रेड पार्क में शहीद होने के बाद इलाहाबाद के गांधी आश्रम के एक स...