Sunday, 29 November 2009

Kashi Sai Image : Part - 23

जलालुद्दीन रूमी की शायरी का हिन्दी अनुवाद

Friday, 27 November 2009

आतंकवाद से लड़ने की पहल : 1

२३-११-२००७ में कोर्ट ब्लास्ट में घायल अधिवक्ता की आर्थिक सहायता:-



छाया चित्र चेक व स्मृति चिन्ह प्रदान करते हुए

समाचार (News) जिसको संज्ञान लेकर काशी साईं ने कोर्ट ब्लास्ट में घायल की आर्थिक सहायता करने का फैसला लिया गया


आर्थिक सहायता के चेक (Cheque) की फोटोकॉपी


आर्थिक सहायता के पत्र (letter) की फोटोकॉपी

समाचार पत्र (News Paper) में प्रकाशन हेतु

Thursday, 26 November 2009

कबीर ने कहा है: भाग - 23

कबीर ने कहा है, कि.....
"कबिरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर
ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर
ना काहू से बैर ज्ञान की अलख जगावे
भूला भटका जो होय राह ताही बतलावे
बीच सड़क के मांहि झूठ को फोड़े भंडा
बिन पैसे बिन दाम ज्ञान का मारै डंडा।"

शहीद की माँ : हरिवंशराय बच्चन

श्री बच्चन जी की यह कविता 23/11/2007 (उत्तर प्रदेश कोर्ट ब्लास्ट) व 26/11/2008 (मुंबई हमला) में शहीद जवानों व भारतीयों को व उनके परिवार को शत शत नमन के साथ समर्पित है:-




इसी घर से
एक दिन
शहीद का जनाज़ा निकला था,
तिरंगे में लिपटा,
हज़ारों की भीड़ में।
काँधा देने की होड़ में
सैकड़ो के कुर्ते फटे थे,
पुट्ठे छिले थे।
भारत माता की जय,
इंकलाब ज़िन्दाबाद, (2009 में शायद यह होना चहिये "अमर शहीद जवान ज़िन्दाबाद")
अंग्रेजी सरकार मुर्दाबाद (2009 में शायद यह होना चहिये "आतंकवाद व भ्रष्टाचार मुर्दाबाद")
के नारों में शहीद की माँ का रोदन
डूब गया था।
उसके आँसुओ की लड़ी
फूल, खील, बताशों की झडी में
छिप गई थी,
जनता चिल्लाई थी-
तेरा नाम सोने के अक्षरों में लिखा जाएगा।
गली किसी गर्व से दिप गई थी।




इसी घर से
तीस बरस बाद
शहीद की माँ का जनाजा निकला है,
तिरंगे में लिपटा नहीं,
(क्योंकि वह ख़ास-ख़ास
लोगों के लिये विहित है)
केवल चार काँधों पर
राम नाम सत्य है
गोपाल नाम सत्य है
के पुराने नारों पर;
चर्चा है, बुढिया बे-सहारा थी,
जीवन के कष्टों से मुक्त हुई,
गली किसी राहत सेछुई छुई।

Kashi Sai Image : Part - 22


Thursday's Sai Vani: Part - 1

Thursday's Sai Vani:
"God is the master, None else is the master. His actions are supernatural, invaluable & full of wisdom."

Wednesday, 25 November 2009

काहे ते हरि मोहिं बिसारो : तुलसीदास

काहे ते हरि मोहिं बिसारो।
जानत निज महिमा मेरे अघ, तदपि न नाथ सँभारो॥१॥
पतित-पुनीत दीन हित असुरन सरन कहत स्त्रुति चारो।
हौं नहिं अधम सभीत दीन ? किधौं बेदन मृषा पुकारो॥२॥
खग-गनिका-अज ब्याध-पाँति जहँ तहँ हौहूँ बैठारो।
अब केहि लाज कृपानिधान! परसत पनवारो फारो॥३॥
जो कलिकाल प्रबल अति हो तो तुव निदेस तें न्यारो।
तौ हरि रोष सरोस दोष गुन तेहि भजते तजि मारो॥४॥
मसक बिरंचि बिरंचि मसक सम, करहु प्रभाउ तुम्हारो।
यह सामरथ अछत मोहि त्यागहु, नाथ तहाँ कछु चारो॥५॥
नाहिन नरक परत मो कहँ डर जद्यपि हौं अति हारो।
यह बड़ि त्रास दास तुलसी प्रभु नामहु पाप न जारो॥६॥

चंद्रशेखर आज़ाद के अंतिम संस्कार के बारे में जानने के लिए उनके बनारस के रिश्तेदार श्री शिवविनायक मिश्रा द्वारा दिया गया वर्णन पढ़ना समीचीन होगा:-

उनके शब्दों में—“आज़ाद के अल्फ्रेड पार्क में शहीद होने के बाद इलाहाबाद के गांधी आश्रम के एक स...