गुरू और ईश्वर के सम्बंध में कबीर दास जी के दोहे - 4
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान । सीस दिये जो गुर मिलै, तो भी सस्ता जान ॥ भावार्थ - यह शरीर तो बिष की लता है, बिषफल ही फलेंगे इसमें । और, गुरु तो अमृत की खान है। सिर चढ़ा देने पर भी सद्गुरु से भेंट हो जाय, तो भी यह सौदा सस्ता ही है ।
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