Tuesday, 24 November 2009

प्यार और ध्यान

संतमत: "ढाई आखर प्रेम के पड़े सो पंडित होई"
जगह-जगह मंदिर होते है ताकि हमें याद रहे की भगवान भी है, हम कितने भी अधार्मिक है अगर हमारे दिल में थोडा सा भी भाव है या डर है भगवान के लिए तो कही भी गली, नुक्कड़ पे कोई मंदिर दिख जाता है तो हम झुक के नमस्कार करते है।
संतो ने जगह-जगह मंदिरों की स्थापना की ताकि इसी बहाने हम झुकना सिख जाये, हम हर गुरूद्वारे, मंदिर - मस्जिद में झुकते है, हर चर्च में घुटनों के बल बैठ जाते है, घुटने टेक देते है भगवान के आगे, इस विचार धारा के साथ कि "मै नहीं तू ही है"।
तो भगवान ने जो ज्ञान उतरा था वेद-शास्त्रों में वो संस्कृत में था, ब्राम्हण को भाषा आती थी, तो उन शास्त्रों पे अधिकार हो गया ब्राम्हणों का वे अपने आप को ज्ञान के ज्ञाता कहलाने लग गए, और शोषण करने लग गए।
हर मंदिर में पंडित बैठा है, भगवान और भक्त के बीच में पंडित खड़ा है और वो ये कहता है मै जो मंतर पडूंगा, तभी तो भगवान सुनेगा।
वहा द्वारका और दुरसे तीर्थ क्षेत्रो में देखो तो पंडित घूमते रहते है की मेरे से पूजा करा लो ये-ये फल, पुण्य मिलेंगा बहोत उकसाते है और हम भी ठगे जाते है, जबकि भगवान् & भक्त के बिच पंडित का कोई काम ही नहीं है ।

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सवाल: "काशी साईं" संस्था का उदय कैसे हुआ ?

उतर:
काशी के "महान संत कबीर" ने अपने एक दोहे में यह कहा है कि.....

"साईं इतना दीजिए, जामें कुटुम्ब समाये,
मैं भी भूखा ना रहू, साधू ना भूखा जाए।"


बस "संत कबीर" के इसी दोहे से "काशी साईं" संस्था का उदय हुआ है।

(इस के अलावा "महान संत कबीर" ने और भी अनगिन्नत दोहों में "साईं" शब्द का उपयोग किया है।)


काशी साईं फाउंडेशन सोसाइटी के मूल विचार:-

"मानव प्रेम ही ईश्वर प्रेम है"

"साईं मानव प्रेम, साईं ईश्वर प्रेम"
हमारी सोसाइटी का मानना है, कि भारत में "साईं" नाम ही एक ऐसा नाम है, जो बटवारा नहीं करता इसीलिए हमारी सोसाइटी "जय साईं भारत" कहती है...!!
हमारी सोसाइटी का यह प्रयास है, कि साईं के नाम पर पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोया जाये, ताकि भारत में किसी भी किस्म का बटवारा ना रह जाये....!!

"Jai Sai Bharat"

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गुरू र्ब्रह्मा,गुरू र्विष्णुः,गुरू र्देवो महेश्वरः

गुरू र्साक्षात् परब्रह्म् तस्मै श्री गुरवे नमः॥

अखण्ड मण्डलाकांरं व्याप्तं येन चराचरम्

तत्विदं दर्शितं येन,तस्मै श्री गुरवे नमः॥

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जन गण मन : रवीन्द्रनाथ ठाकुर

जन गण मन अधिनायक जय हे
भारत भाग्य विधाता
पंजाब सिन्ध गुजरात मराठा
द्राविड़ उत्कल बंग
विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा
उच्छल जलधि तरंग
तव शुभ नामे जागे
तव शुभ आशिष मागे
गाहे तव जय गाथा
जन गण मंगल दायक जय हे
भारत भाग्य विधाता
जय हे जय हे जय हे
जय जय जय जय हे

Note: इस रचना के यहाँ तक के पदों को भारत के राष्ट्रगान होने का सम्मान प्राप्त है। यहाँ से नीचे दिये गये पद भारतीय राष्ट्रगान का अंग नहीं हैं.

Rest Part:

पतन-अभ्युदय-वन्धुर-पंथा,
युगयुग धावित यात्री,
हे चिर-सारथी,
तव रथ चक्रेमुखरित पथ दिन-रात्रि
दारुण विप्लव-माझे
तव शंखध्वनि बाजे,
संकट-दुख-श्राता,
जन-गण-पथ-परिचायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे

घोर-तिमिर-घन-निविङ-निशीथ
पीङित मुर्च्छित-देशे
जाग्रत दिल तव अविचल मंगल
नत नत-नयने अनिमेष
दुस्वप्ने आतंके
रक्षा करिजे अंके
स्नेहमयी तुमि माता,
जन-गण-दुखत्रायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे

रात्रि प्रभातिल उदिल रविच्छवि
पूरब-उदय-गिरि-भाले, साहे विहन्गम, पूएय समीरण
नव-जीवन-रस ढाले,
तव करुणारुण-रागे
निद्रित भारत जागे
तव चरणे नत माथा,
जय जय जय हे, जय राजेश्वर,
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे