यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।
सीस दिये जो गुर मिलै, तो भी सस्ता जान ॥
भावार्थ - यह शरीर तो बिष की लता है, बिषफल ही फलेंगे इसमें । और, गुरु तो अमृत की खान है। सिर चढ़ा देने पर भी सद्गुरु से भेंट हो जाय, तो भी यह सौदा सस्ता ही है ।
Monday, 6 April 2009
साईं ने कहा है : भाग-20
साईं ने कहा है, कि......
अपने गुरु के प्रति श्रधा और अटूट विश्वास रखो,
सदा याद रखो की वे ही ब्रम्हांड का नियंत्रण करता व संचालक है,
Sunday, 5 April 2009
साईं ने कहा है : भाग - 19
साईं ने कहा है, कि.....
"मैं हर जीव जंतु में हूँ, जो इन प्राणियों में मेरा दर्शन करता है वो मुझे अति प्रिय है।"
"मैं हर जीव जंतु में हूँ, जो इन प्राणियों में मेरा दर्शन करता है वो मुझे अति प्रिय है।"
Friday, 3 April 2009
गुरू और ईश्वर के सम्बंध में कबीर दास जी के दोहे - 3
'कबीर' सतगुर ना मिल्या, रही अधूरी सीष ।
स्वांग जती का पहरि करि, घरि घरि माँगे भीष ॥
भावार्थ - कबीर कहते हैं -उनकी सीख अधूरी ही रह गयी कि जिन्हें सद्गुरु नहीं मिला । सन्यासी का स्वांग रचकर, भेष बनाकर घर-घर भीख ही माँगते फिरते हैं वे ।
स्वांग जती का पहरि करि, घरि घरि माँगे भीष ॥
भावार्थ - कबीर कहते हैं -उनकी सीख अधूरी ही रह गयी कि जिन्हें सद्गुरु नहीं मिला । सन्यासी का स्वांग रचकर, भेष बनाकर घर-घर भीख ही माँगते फिरते हैं वे ।
Thursday, 2 April 2009
साईं ने कहा है : भाग - 18
साईं ने कहा है.... कि
प्रस्संचित से अपने सांसारिक कार्यकलाप करते रहो लेकिन ईश्वर को कभी मत भूलो , सदा प्रभु का समरण करो।
गुरू और ईश्वर के सम्बंध में कबीर दास जी के दोहे - 2
सतगुरु लई कमांण करि, बाहण लागा तीर ।
एक जु बाह्या प्रीति सूं, भीतरि रह्या शरीर ॥
भावार्थ - सदगुरु ने कमान हाथ में ले ली, और शब्द के तीर वे लगे चलाने । एक तीर तो बड़ी प्रीति से ऐसा चला दिया लक्ष्य बनाकर कि, मेरे भीतर ही वह बिंध गया, बाहर निकलने का नहीं अब ।
एक जु बाह्या प्रीति सूं, भीतरि रह्या शरीर ॥
भावार्थ - सदगुरु ने कमान हाथ में ले ली, और शब्द के तीर वे लगे चलाने । एक तीर तो बड़ी प्रीति से ऐसा चला दिया लक्ष्य बनाकर कि, मेरे भीतर ही वह बिंध गया, बाहर निकलने का नहीं अब ।
Wednesday, 1 April 2009
गुरू और ईश्वर के सम्बंध में कबीर दास जी के दोहे - 1
राम-नाम कै पटंतरै, देबे कौं कछु नाहिं ।
क्या ले गुर संतोषिए, हौंस रही मन माहिं ॥
भावार्थ - सद्गुरु ने मुझे राम का नाम पकड़ा दिया है । मेरे पास ऐसा क्या है उस सममोल का, जो गुरु को दूँ ?क्या लेकर सन्तोष करूँ उनका ? मन की अभिलाषा मन में ही रह गयी कि, क्या दक्षिणा चढ़ाऊँ ? वैसी वस्तु कहाँ से लाऊँ ?
क्या ले गुर संतोषिए, हौंस रही मन माहिं ॥
भावार्थ - सद्गुरु ने मुझे राम का नाम पकड़ा दिया है । मेरे पास ऐसा क्या है उस सममोल का, जो गुरु को दूँ ?क्या लेकर सन्तोष करूँ उनका ? मन की अभिलाषा मन में ही रह गयी कि, क्या दक्षिणा चढ़ाऊँ ? वैसी वस्तु कहाँ से लाऊँ ?
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उनके शब्दों में—“आज़ाद के अल्फ्रेड पार्क में शहीद होने के बाद इलाहाबाद के गांधी आश्रम के एक स...
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‘Life with Allah has endless hope;life without Allah has hopeless end.’ Islam means submission to the will of Allah. It is a perfect way of ...
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पर्यावरण शुद्धिकरण व भारत प्रेम की भावना को जागृत करने के लिए आर्या समाज पद्धति से हवन का आयोजन: पारस नाथ यादव (अधिवक्ता), सतेन्द्र कुमार श...