कबीर ने कहा है, कि.....
"करता दीसै कीरतन, ऊँचा करि-करि तुंड ।
जानें-बूझै कुछ नहीं, यौंहीं आंधां रूंड ॥"
भावार्थ -
हमने देखा ऐसों को, जो मुख को ऊँचा करके जोर-जोर से कीर्तन करते हैं । जानते-समझते तो वे कुछ भी नहीं कि क्या तो सार है और क्या असार । उन्हें अन्धा कहा जाय, या कि बिना सिर का केवल रुण्ड ?
No comments:
Post a Comment